मध्यप्रदेश न्यूज़:- पूरे देश में रावण दहन अमूमन दशहरे पर ही होता ही है, लेकिन मप्र के नीमच स्थित रावण रुंडी में शरद पूर्णिमा पर रावण दहन एक अनोखी परंपरा के साथ होता है। यह परंपरा 300 वर्षों से चली आ रही है जिसे आज भी यहाँ के लोगो ने जारी रखी है। इस दिन यहां पर रावण दहन लोग करते आ रहे है, जिसमें नीमच सहित आस-पास के एक दर्जन गांव के हजारों लोग शामिल होते है।

मध्यप्रदेश न्यूज़:- शरद पूर्णिमा पर रावण दहन के ये अनोखी परंपरा ग्वालियर के सिंधिया घराने ने शुरू की थी। बता दें कि नीमच के उपनगर रावण रुंडी क्षेत्र में करीब 300 वर्ष पहले से यह परंपरा चली आ रही है, जिसे यहाँ के लोग आज भी जारी रखे हुए है। शहर के दशहरे पर रावण दहन के होने वाले मुख्य समारोह के बाद शरद पूर्णिमा पर यहाँ फिर रावण दहन किया जाता है।

मध्यप्रदेश न्यूज़:- इस दिन रावण दहन की इस अनोखी परंपरा को लेकर लोगो का कहना है कि ग्वालियर रियासत के समय से यह परंपरा चली आ रही है और उसी परंपरा अनुसार ही इस बार भी यहाँ शरद पूर्णिमा की शाम आतिशबाजी की जाती है। राम, लक्ष्मण, हनुमान सहित रावण और विभिन्न स्वांगधारी लोगो का खूब मनोरंजन करते है। उसके बाद काल भैरो, नील भैरो और सिंदूरी भैरो ने परिक्रमा की जाती है । परिक्रमा के पश्चात अतिथियों द्वारा 31 फिट ऊंचे रावण का दहन किया जाता है।

65 वर्ष पूर्व बनी रावण की स्थाई सीमेंट की प्रतिमा

मध्यप्रदेश न्यूज़:- करीब 65 वर्ष पूर्व रावण की स्थाई प्रतिमा का निर्माण यंहा के लोंगो द्वारा किया गया था। इस पर शरद पूर्णिमा के दिन पटाखों की माला पहनाकर आतिशबाजी के साथ रावण का एक और पुतला भी दहन किया जाता है। कुछ वर्षों पूर्व रावण की प्रतिमा के ठीक सामने भगवान राम की स्थाई प्रतिमा का निर्माण भी आयोजकों द्वारा करवाया गया,प्रतिमा के स्वरुप में भगवान तीर कमान से रावण का वध करते नजर आ रहे है।

क्या कहते है इतिहासकार इस परंपरा के बारे में

मध्यप्रदेश न्यूज़:- रावण रुंडी क्षेत्र में बरसों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। दशहरे के 5 दिन बाद रावण दहन किया जाता है। इतिहासकारों के अनुसार यह परंपरा देश के किसी भी क्षेत्र में नहीं है। नीमच सिटी एक मात्र ऐसा क्षेत्र है जहां शरद पूर्णिमा पर रावण के पुतले का दहन होता है।

मध्यप्रदेश न्यूज़:- यह परंपरा दक्षिण पंथिय मैसूर पद्धति पर आधारित है। जो शहर में मराठों के आगमन के साथ शुरुआत हुई थी। जब यह नगर ग्वालियर स्टेट शामिल हुआ तब से मराठे नीमच में बसे और 1733 में राणो जी सिंधिया द्वारा गढ़ी (कचहरी) का निर्माण करवाया था। तब से यहां दरबार हाल बना कर दशहरा उत्सव की प्रथा प्रारंभ की गई थी।

मध्यप्रदेश न्यूज़:- उस जमाने में दशहरे के दिन ग्वालियर रियासत के तमाम जागीरदार संबंधित ठिकाने में जाते वहां दरबार हाल में गादी रखी जाती और गादी पर ग्वालियर महाराज उसका चित्र रखा जाता और रियासत के जागीरदार बारी-बारी से आते और अपने ओहदे के अनुसार नजराना पेश करते थे। यह आयोजन दशहरे के दिन किया जाता है।

मध्यप्रदेश न्यूज़:- इससे पहले सभी जागीरदार जुलूस के साथ नगर के बाहर ऊंचे टीले पर शमी वृक्ष की पूजा करते थे। दशहरा उत्सव का प्रारंभ विजय के प्रतीक के रुप में होता था। रावण रुंडी उसी विजय के प्रतीक का स्थान है। जहां ग्वालियर रियासत के अधीन आने वाले समस्त जागीरदार दशहरा उत्सव मनाने आते थे।

मध्यप्रदेश न्यूज़:- आजादी के बाद यह पुतले के रुप में रावण का दहन किया जाता। उस दौर में इस क्षेत्र को रावण मगरा नाम से जाना जाता था। बुजुर्गों के अनुसार सिटी के पास खाली पड़े मैदान पर लोग रावण दहन के लिए आते थे और शेष दिनों में यह मैदान वीरान रहता था लेकिन धीरे-धीरे यहां बस्तियां बस गई।

मध्यप्रदेश न्यूज़:- इसके बाद रावण का पुतला फूंकने के लिए आपसी खींचतान का दौर वर्षों तक चलता रहा। लोगों ने करीब 65 साल पहले रावण की स्थाई प्रतिमा का निर्माण कर दिया। इस पर पटाखों की माला पहना कर आतिशबाजी के साथ रावण का एक और पुतला भी दहन किया जाता है।

इतिहास के पन्नों पर नीमच सिटी का महत्वपूर्ण स्थान

मध्यप्रदेश न्यूज़:- नीमच के इतिहासकार व पुरातत्व वक्ता डॉ. सुरेंद्र शक्तावत ग्वालियर रिसायत काल के दौर में जीवाजी राव सिंधिया के पिता माधवराव प्रथम का नीमच आगमन 1939 तो प्रवास के दौरान उन्होंने कचहरी में निवास किया था। उस समय उनको रानी के प्रसव के लिए किसी स्थान का चयन करना था। उन्होंने पीजी कॉलेज स्थित एक भवन का निर्माण कराया लेकिन वापस ग्वालियर लौट गए।

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